आशाओं और आकांक्षाओं की एक अभिव्यक्ति

1951 में कॉक कलर्स

1951

हाथरस में दादाजी श्री कुंदनलाल भगत जी और उनके पुत्र श्री गोपाल दास जी ने संयुक्त परिवार के साथ कंपाउंड हींग, रंग और गुलाल की दुकान से छोटी फैक्ट्री तक का सफ़र शुरू किया।

1967 में कॉक कलर्स

1967

छोटी फैक्ट्री बड़ी फैक्ट्री में बदली, रंग और हींग की पैकिंग की कई अलग-अलग किस्मों के साथ।

1981 में कॉक कलर्स

1981

श्री श्याम बिहारी जी और श्री रतन बिहारी नई पीढ़ी के रूप में कंपनी में आए — नए और अलग विचारों के साथ नवोन्मेषी पैकेजिंग शैलियाँ लाए, उच्च स्तरीय तकनीक से सामग्री बदली, और अफ़ग़ानिस्तान तथा अन्य देशों से हींग का आयात भी शुरू किया।

2001 में कॉक कलर्स

2001

श्री मनु गर्ग कंपनी में आए और हाथरस इकाइयों में कॉक ब्रांड रंग व गुलाल तथा गोपाल एवं बेबी हींग को एक नई ऊँचाई तक पहुँचाया।

2010 में कॉक कलर्स

2010

श्री शांतनु गर्ग ने दिल्ली इकाई में विभिन्न पैकिंग के साथ मेवाबाइट ड्राईफ्रूट्स रेंज शुरू की।

2018 में कॉक कलर्स

2018

श्री कार्तिकेय गर्ग कंपनी से जुड़े और ड्राईफ्रूट्स का आयात तथा रंग व गुलाल का निर्यात शुरू किया, व्यवसाय को बेहतर बनाने के लिए नए विचार लाए, और एक मोबाइल एप्लिकेशन भी लॉन्च की — “सभी वस्तुएँ इसी एप्लिकेशन पर खरीदने के लिए सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता।”

2021 में कॉक कलर्स

2021

श्री सागर रतन गर्ग ऑनलाइन व्यवसाय को बढ़ाने और एप्लिकेशन को बेहतर बनाने के लिए पारिवारिक व्यवसाय में शामिल हुए। 1990 से पहले रंग के व्यापार में गुलाल 50 किलो की बोरियों में और रंग 50 ग्राम के डिब्बे से 1 किलो तक बिकता था, तब श्याम बिहारी अग्रवाल ने पाउच पैकिंग की शुरुआत की। शुरुआती 4-5 साल तक लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया, यह कहकर कि ब्रांडेड पैकिंग बाज़ार में नहीं चलेगी; फिर हमने बड़े बाज़ार तक पहुँचने के लिए कई वज़नों में और पैकिंग शुरू कीं, और धीरे-धीरे लोग पाउच पैकिंग को सराहने लगे। इन वर्षों में श्याम जी ने जो जोखिम उठाया, उसके कारण उन्हें बाज़ार की बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बाज़ार में हर्बल रंग आने से भी पहले हमने होली को सुरक्षित और आनंदमय त्योहार बनाने की सोच के साथ ग़ैर-विषैले रंग समाधान का उपयोग शुरू किया, और 2010 में हर्बल गुलाल की पहल भी हमने ही की — इस्तेमाल होने वाले रसायनों पर बहुत शोध करके, ताकि रंग सुरक्षित भी हों और जनता के लिए सस्ते व सुलभ भी। इसी दौरान हमने भारत में बिक्री और निर्यात, दोनों के लिए अपने फ़ॉर्मूलों की वैश्विक स्वीकृतियाँ लेना शुरू किया — किसी और कंपनी ने ये बदलाव करने के बारे में सोचा तक नहीं, क्योंकि इनसे लागत बढ़ती है और होली एक दिन का त्योहार है।

आज

वह अध्याय जो अब भी लिखा जा रहा है

Ratan Behari Agrawal, Manu Garg, Shantanu Garg, Kartikey Garg और Sagar Ratan Garg इस काम को आगे ले जा रहे हैं — नए बाज़ार खोलते हुए, नए उत्पाद बनाते हुए, और समूह की पहुँच को और विस्तार देते हुए।

हाथरस में जो एक पारिवारिक व्यवसाय के रूप में शुरू हुआ था, वह अब उससे कहीं बड़ा बन रहा है। ज़िम्मेदारी उठाने वाली टीमें बनाई जा रही हैं, ऐसी प्रणालियाँ स्थापित की जा रही हैं जो बड़े पैमाने पर टिकें, और सात दशकों की कारीगरी पर स्टार्टअप की गति जोड़ी जा रही है — ताकि समूह का हर ब्रांड अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच सके।

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